Mazaak

Anuv Jain

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    ये भी मज़ाक ही तो ह
    सालों से सड़कों पे संभल के चल रहा था य
    गालों के गड्ढों में तेर
    ना जाने क्यों मैं लड़खड़ाके गिर गया ह
    मुस्कुराओ, और ऐसे हंसो मेरी बातों प
    गिरता रहूँ, तेरी राहों में और इन्हीं में ही खोजूँग

    ये भी मज़ाक ही तो ह
    कैसे रातों के इरादों में अंधेरा था य
    आधे से चाँद सी हंस
    अंधेरी रातों में अब नूर बन गई क्य
    ए चाँद, अब चाँदनी बनके गिरो ज़र
    गिरते रहो मेरे आस पास, तो तेरा ही हो जाऊँग

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    हो जाऊँगा तेरा, एहसास ह
    साँसें हैं जब तक हैं यहाँ, हो जाऊँ मैं तेर
    ये ना मेरा, अंदाज़ ह
    देखो मैं खुद हंस रहा अपनी बातों पे यह
    ऐसे तुम भी हंसो मेरी बातों प
    ना जाने क्या हो रहा मुझ
    मैं तेरा ही हो जाऊँगा, हो जाऊँग

    ये भी मज़ाक ही तो ह
    मेरी नकल हैं या असल में गिर रहे हो तुम भी?
    होता नहीं हैं अब यकीन
    क्या ये मज़ाक तो नहीं?

    Información de la canción

    Composición: Anuv Jain

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