किसके करीब हुए
फूलों के शहर में हमें कांटे ही नसीब हुए
बिलाल को छोड़कर वो न जाने किसके करीब हुए
फूलों के शहर में हमें कांटे ही नसीब हुए
बिलाल को छोड़कर वो न जाने किसके करीब हुए
रफ्ता-रफ्ता यादें तेरी मुझ में समाने लग
सीने में दफ्न खामोशी भी शोर मचाने लग
लिखते हुए पन्नों पर उंगलियां भी कपकपाने लग
कलम भी रोने लगा और स्याही आंसू बहाने लग
क्या करूं मैं, एक अजीब-सी घुटन है रातों म
हर सपना बिखर गया मेरा, मेरी ही आंखों म
बह गए अल्फाज़ मेरे, मेरे ही आंसुओं म
डूब गई हर ख्वाहिश मेरी, मेरी ही सांसों म
तन्हा ही रहना चाहता हूं मैं अब अपने कमरे म
हर तरफ तकियों पर पड़े हुए आंसुओं के कतरे ह
बिलाल की धड़कनें भी अब रूठी-सी लगती ह
ज़मीन पर मेरे सारे अरमान बिखरे ह
फूलों के शहर में हमें कांटे ही नसीब हुए
बिलाल को छोड़कर वो न जाने किसके करीब हुए
अब बिलाल को हो गई है हर चीज़ से नफरत
पारो, कैसी जमी हुई है तेरी यादों की परत
तुझे मुझ पर एक बार तरस नहीं आय
क्या तुझ में खत्म हो गई है गैरत?
मुर्झा हुआ हूं किसी फूल की तरह
बिखरा हुआ हूं कतरे-खून की तरह
ढूंढ रहा हूं खुशी के दो पल
नहीं मिलती मुझे अब कहीं भी पनाह
क्यों तुझ में वो पहले वाली बात न रह
क्या तुझे चाहने की मेरी औकात न रही?
क्या तेरे फैसलों की मैंने कदर न की?
या बिलाल रहा, पारो, तेरे लायक नहीं?
बिलाल के साथ पारो, तूने ऐसा क्यों किया?
क्यों अपनापन जताना तूने बंद कर दिया?
जिस रात तूने मुझसे गुफ्तगू न क
भूल नहीं पा रहा मैं वो वाकिय
फूलों के शहर में हमें कांटे ही नसीब हुए
बिलाल को छोड़कर वो न जाने किसके करीब हुए
तेरी हर अदा मुझे लगने लगी थी बदली-बदल
जिस्म में बेचैनी थी, नहीं मिल रही थी तसल्ल
जो भी बात थी दिल में तेरे, वो मुझको बतात
जब से तू गई है छोड़कर, कोई खुशी न मिल
तूने क्यों मुझे तन्हा इस शहर में छोड़ दिया?
ग़मों से रिश्ता जुड़ गया, खुशियों ने नाता तोड़ लिय
हवाएं भी नाराज़ हो गई मुझस
मुझे तेरे हर सितम ने अंदर तक झनझोड़ दिय
पारो, बता तेरा ज़मीर क्यों मर गया?
क्यों बिलाल से अचानक तेरा मन भर गया?
मैं बैठा रहा तेरे इंतज़ार म
दुनिया बदल गई, ज़माना आगे बढ़ गय
पर तेरे ज़ख्म जो कभी भरते ही नह
कोई दिन ऐसा नहीं, मेरे ख्वाब मरते हों नह
एक दिन काटना भी अब साल लगता ह
ये कांटों का सफर मुकम्मल होता ही नह
ज़िंदगी में कोई खुशी आई न तेरे बाद
मिल रहा है मुझे किस गुनाह का अज़ाब?
तेरी बेवफाई ने मुझे तोड़ दिय
फिर भी नहीं जाता ज़ुबान से तेरा स्वाद
जिस्म थक गया है पर नींद उड़ि रहती ह
देर रात तक आंखें मेरी खुली रहती ह
लेता रहता हूं बेजान सा बिस्तर प
तुझे सोचते हुए सांस अब फूली रहती ह
फूलों के शहर में हमें कांटे ही नसीब हुए
बिलाल को छोड़कर वो न जाने किसके करीब हुए
किसके करीब हुए
बिलाल अंसार