तेरी यादों की ज़ंजीर स
रात होते ही बढ़ जाता है, ये दर्द फिर स
जैसे लगा हो घाव किसी शमशीर स
इस कैद से आज़ाद मैं हो न सक
बंदा हूँ, तेरी यादों की ज़ंजीर स
जब देखता हूँ आईने में खुद का चेहर
बिलाल के चेहरे पर रहता है एक दर्द गहर
सन्नाटा सा छाया रहता है हर तरफ
जैसे दरिया का कोई पानी हो ठहर
आँखें मेरी सूजी, बदली सी है शक्ल
सब कहते हैं बिलाल हो गया पागल
अब मुझे बड़ी ही बेचैनी रहती ह
इस दिल में अजीब सी होती है हलचल
इस बंद कमरे में रहता हूँ मैं बड़ा ही बेतााब
रोज़ देखता हूँ, और रोज़ टूटते हैं ख्वाब
सवालों की तो यहाँ लग रही है कतार
लेकिन मिलता नहीं मुझे कहीं भी जवाब
चार दीवारी में सिमट गया मेरा ये राज
ना कोई शोर है यहाँ, ना कोई है आवाज
सबको कहता हूँ मुझे अकेला छोड़ द
तन्हा रहने का मेरा बन गया है रिवाज
बेड पे लेटा हूँ, सारी Light Off ह
बिलाल को सिर्फ तन्हाई मिली, तेरा हो क
अब दुनिया बड़ी वीरान लगती ह
मगर तुझे क्या मिला, पारो, मुझे खो क
रात होते ही बढ़ जाता है, ये दर्द फिर स
जैसे लगा हो घाव किसी शमशीर स
इस कैद से आज़ाद मैं हो न सक
बंदा हूँ, तेरी यादों की ज़ंजीर स
अब वो सुकून नहीं आता मुझे सोने म
बैठा रहता है बिलाल चुपचाप कोने म
देखता हूँ, तेरी कुछ पुरानी तस्वीर
कितनी तकलीफें होती हैं किसी एक का होने म
तू चली गई, पर तेरी यादें यहीं हैं खड
देखता रहता हूँ, मैं तंगी दीवार पे घड
पारो, वक्त बीतता चला जा रहा ह
पर अब अच्छी खबर कोई आती नह
सारा वक्त गुजरता है अब फोन की Screen प
उसे अफसोस नहीं होता, फिदा हुए जिस प
जब अपने करीबी का ये हाल ह
तो इस झूठी दुनिया में यकीन करे किस प
पारो, क्यों तूने मेरा ऐतबार तोड़ दिय
मुझे ऐसे ही मरने के लिए छोड़ दिय
तुझे खुद से ज़्यादा मैं चाहता रह
फिर तूने क्यों बिलाल को ऐसे ही खो दिय
बिलाल ने प्यार तुझसे बखूबी निभाय
हर हाल में बस तेरा ख्वाब सजाय
हर कोशिश की तुझे खुश करने क
पर बदले में मेरे, सिर्फ दुख ही आय
रात होते ही बढ़ जाता है, ये दर्द फिर स
जैसे लगा हो घाव किसी शमशीर स
इस कैद से आज़ाद मैं हो न सक
बंदा हूँ, तेरी यादों की ज़ंजीर स
अब किसी से मैं बात नहीं करना चाहता ह
आँखों से बस मैं पानी बहाता ह
बिलाल के चेहरे का रंग उड़ गया ह
दुखी गाने लिखता हूँ, और गाता ह
जैसे घर बन गया कब्रिस्तान स
जैसे क़ब्र में सोया हूँ मैं शांत स
अब जिस्म लगता है ये बेजान स
पर दिल में उठता है रोज़ तूफ़ान स
क्यों न जान पाई तू मेरी मजबूरिय
अब लगती है झूठी मुझे सारी दुनिय
मैंने कानों में लगा ली हैं उंगलिय
और इस दुनिया से मैंने बढ़ा ली हैं दूरिय
रात होते ही बढ़ जाता है, ये दर्द फिर स
जैसे लगा हो घाव किसी शमशीर स
इस कैद से आज़ाद मैं हो न सक
बंदा हूँ, तेरी यादों की ज़ंजीर स
बिलाल अंसार