क्रोध की आग जला दे तप, यश और सारा मान
क्षमा अपनाए जो साधु, ऊँचा हो उसका स्थान।
मन में प्रेम और दया हो, दूर रहे हर बुरा विचार
क्षमा ही साधुओं का धन है, क्षमा जीवन का आधार।

जब मन में गहरा अँधेरा छाया
बदले की आग ने घर बनाया।
सुना अपनों का बुरा हुआ है
मन ने कहा, हिसाब चुकाना है।

बस एक पल में क्रोध बढ़ा था
सही-गलत का ज्ञान मिटा था।
तभी एक बूढ़ा राहगीर आया
उसने प्रेम से मुझे समझाया।

बिना सोचे कोई काम न करना
क्रोध में अपना जीवन न भरना।
जो होना था, वही हुआ है
हर कर्म का फल सबने पाया है।

तू किसको अपना शत्रु बनाता?
क्यों मन में बदले को जगाता?
जो जैसा कर्म यहाँ करता है
वैसा ही फल खुद वह भरता है।

क्रोध की आग जला दे तप, यश और सारा मान
क्षमा अपनाए जो साधु, ऊँचा हो उसका स्थान।
मन में प्रेम और दया हो, दूर रहे हर बुरा विचार
क्षमा ही साधुओं का धन है, क्षमा जीवन का आधार।

साधुओं की सबसे बड़ी कमाई
क्षमा है शीतल छाँव सुहाई।
जो निर्दोष पर क्रोध दिखाता
वह खुद अपना दुख बढ़ाता।

तन को पीड़ा, मन को चोट
धन और सुख में आती खोट।
दूसरे का बुरा जो चाहे
अपने जीवन में दुख ही पाए।

गुरु की मीठी बात को माना
शांत हुआ मन, क्रोध मिटाना।
यज्ञ छोड़कर बैर भुलाया
दिल को फिर से साफ बनाया।

मन में शांति की धारा आई
प्रेम की सुंदर ज्योति समाई।
बदले का हर भाव मिटाकर
क्षमा को अपने गले लगाया।

तभी प्रभु ने सामने आकर
कहा प्रेम से हाथ बढ़ाकर
मन में बदले का भाव था फिर भी
तुमने बड़ों की बात मानी।

इस क्षमा की शक्ति से तुम
शास्त्रों का सच्चा ज्ञान पाओगे।
ज्ञान का दीप जलेगा मन में
प्रभु का रूप पहचान पाओगे।

बुद्धि तुम्हारी साफ रहेगी
सच्ची राह दिखाई देगी।
कर्म और त्याग के दोनों रास्ते
तुमको धीरे समझ आएँगे।

क्रोध की आग जला दे तप, यश और सारा मान
क्षमा अपनाए जो साधु, ऊँचा हो उसका स्थान।
मन में प्रेम और दया हो, दूर रहे हर बुरा विचार
क्षमा ही साधुओं का धन है, क्षमा जीवन का आधार।

हे हरि, मन के दीप जलाने वाले
अपने भक्तों को राह दिखाने वाले।
जब क्रोध का अँधेरा घिर आए
क्षमा का दीपक मन में जलाए।

गुरु चरणों की धूल मैं पाऊँ
शांति का मीठा रस पी जाऊँ।
जिसने मुझसे भूल की हो
उसे भी दिल से क्षमा कर पाऊँ।

यही दया का वर मैं माँगूँ
सच्ची राह पर हर दिन जागूँ।
पुरानी सीख को याद करूँ मैं
मन में मीठी मुस्कान भरूँ मैं।

क्षमा का धन सबमें बाँटूँ
दुखी दिलों के आँसू पोंछूँ।
क्रोध छोड़कर प्रेम अपनाऊँ
सच्चा भक्त तुम्हारा बन जाऊँ।

क्रोध की आग जला दे तप, यश और सारा मान
क्षमा अपनाए जो साधु, ऊँचा हो उसका स्थान।
मन में प्रेम और दया हो, दूर रहे हर बुरा विचार
क्षमा ही साधुओं का धन है, क्षमा जीवन का आधार।

क्षमा से मन निर्मल होता
क्षमा से मिटता हर अँधियार।
क्षमा ही साधुओं का धन है
क्षमा जीवन का सच्चा सार।

Información de la canción

Composición: Hemant Rao

¿Los datos están equivocados?

Revisar composición